Non veg sex story ek haseen galti

Non veg sex story ek haseen galti दोस्तो मैं निशा अपनी कहानी आप को बताने जा रही हू दोस्तो मुझे आशा है कि आपको मेरी कहानी मेरी मजबूरी पसंद आएगी . मेरी शादी मनीष के साथ 2 साल पहले हुई थी . और मैं मनीष के साथ बहुत खुशी से अपना जीवन गुज़ार रही थी

एक दिन मनीष के गाँव से मेरी सासू का फोन आया कि मनीष के चचेरे भाई विकास की शादी है . मैं और मनीष शादी से 8 दिन पहले ही गाँव आ गये . शादी से एक दिन पहले की बात है पूरा घर रिश्तेदारो से भरा पड़ा था . मुझे बहुत तेज पेशाब लगा था लेकिन कोई भी बाथरूम खाली नही था . मैने छत पर जाकर पेशाब करने की सोची . जब मैं छत पर गई तो वान्हा मुझे स्टोर रूम दिखाई दिया . मैने एक डिब्बा लिया और उसे लेकर स्टोर रूम मे आ गई . स्टोर रूम के दरवाजे मे कुण्डी नही थी मैने उसे ऐसे ही भिड़ा दिया और डब्बे को नीचे रख कर उसमे पेशाब करने लगी . मुझे पेशाब करते हुए ये अहसास तक नही हुआ कि कोई दरवाजे को खोल कर अंदर आ चुका है और मुझे पेशाब करते हुए देख रहा है . अचानक मेरी नज़र उस पर पड़ी तो मैं हड़बड़ा कर उठी . मैं पेशाब अभी पूरी तरह नही कर पाई थी . जिसकी वजह से मेरे पेट मे दर्द हो रहा था .

वो कोई और नही मुकेश था . दोस्तो मुकेश एक 48-50 साल का आदमी था जो मनीष का दूर के रिश्ते से अंकल लगता था . जब मैं गाँव आई थी तब मैने उसे पहली बार देखा था . जब मेरी सासू ने उसके पैर छूने के लिए कहा तब मैं उसके पैर छूने के लिए झुकी तो उसने मुझे उठाया और कहा अरे नही बहू तुम्हारी जगह यहाँ नही है . वो मुझे बड़े अश्लील ढंग से घूर रहा था उसकी नज़र मेरी छाती पर गढ़ी हुई थी . उस समय मुझे बहुत गुस्सा आया था लेकिन शरम के मारे चुप रह गई थी . तब से वो मुझे जहाँ भी देखता उसकी नज़र हमेशा मेरी छाती पर ही होती . मुझे उसकी आँखो मे हमेशा वासना ही नज़र आती थी . आज शायद उसे लगा कि मैं छत परअकेली हूँ और वो मौके का फ़ायदा उठाने के लिए मेरे सामने खड़ा वो मुझे बड़ी बेशरामी से घूर रहा था . उसके होंठो पर कुटिल मुस्कान फैली हुई थी . अब वो मेरी चुचियो को एक टक घूर रहा था .

मुझे बहुत गुस्सा आया और मैने उसे गुस्से से कहा तुम्हे शरम नही आती . तुम यहाँ क्या कर रहे हो . क्या तुम्हे अपनी उमर का ख्याल नही है . मुकेश बड़ी बेशर्मी से बोला जानेमन मैं तो तुम्हारी चूत देखने के लिए यहाँ आया था . क्या कातिल जवानी है तुम्हारी कसम से एक बार अगर तुम मुझे अपनी दे दोगि तो मैं धन्य हो जाउन्गा .

मुझे उसकी बात पर बहुत गुस्सा आया और मैने उसके गाल पर एक ज़ोर दार थप्पड़ रसीद कर दिया . और कहा आइन्दा मेरे पास भी फटके तो मुझसे बुरा कोई नही होगा .

एक पल को तो मुकेश की आँखो के आगे सितारे घूम गये. फिर कुछ संभाल कर वो बोला, “जितनी ज़ोर से तूने ये तमाचा मारा है ना, उतनी ही ज़ोर से तेरी गांद ना मारी तो मेरा नाम मुकेश नही.”

मैं उसे कुछ बोलने ही वाली थी कि मुझे स्टोर के बाहर कुछ लोगो की आवाज़ सुनाई दी. मेरी तो साँस ही अटक गयी. हे भगवान अब क्या होगा. लोगो ने मुझे इस सुवर के साथ देख लिया तो मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी. ना जाने लोग क्या क्या समझेंगे.

“लगता है कुछ लोग टहलने के लिए उपर आ गये हैं.” मुकेश ने कहा.

“श्ह्ह चुप रहो तुम कोई सुन लेगा.” मैने धीरे से कहा.

“कितना अच्छा मोका दिया है भगवान ने हमें. हमें इस मोके को गँवाना नही चाहिए.” मुकेश ने धीरे से कहा.

“क्या मतलब है तुम्हारा.”

“देखो ना स्टोर रूम में हम अकेले हैं. दरवाजा बंद है. कुछ भी हो सकता है.” मुकेश ने नशीली आवाज़ में कहा. उसकी बातों में हवस सॉफ दीखाई दे रही थी.

“तुम्हे बिल्कुल शरम नही आती मेरे साथ ऐसी बेहूदा बाते करते हुवे. क्या तुम्हे नही पता कि मैं शरीफ घर की बहू हूँ. ऐसी बाते शोभा नही देती तुम्हे.”

“नाटक मत कर मुझे सब पता है तेरे बारे में.” मुकेश ने कहा.

“तुम्हे कुछ नही पता. चुपचाप खड़े रहो नही तो लोग सुन लेंगे.” मैने आँखे दिखाते हुवे कहा.

“तो सुन लेने दो मेरा क्या जाता है. जो बिगड़ेगा तेरा ही बिगड़ेगा.”

उसकी बात में दम था. मुझे समझ नही आ रहा था कि क्या करूँ. उपर से मैं अभी थोड़ा ही पेसाब कर पाई थी और प्रेशर फिर से बढ़ने लगा था. अब तो और भी मुसीबत हो गयी थी. ना मैं बाहर जा सकती थी ना ही अंदर रह सकती थी. मगर मेरा प्रेशर बढ़ता ही जा रहा था. आख़िर मुझे बोलना ही पड़ा, “तुम थोड़ा घुमोगे.”

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