safed libas mai sundar ladki

safed libas mai sundar ladki “रास्ता भूल गये हैं क्या साहिब” आवाज़ सुनकर मैं पलटा

वो एक छ्होटे से कद की लड़की थी, मुश्किल से 5 फुट, रंग सावला और आम सी शकल सूरत. देखने में उसमें कोई भी ख़ास बात नही थी जो एक लड़के को पसंद आए. उसने एक सफेद रंग की सलवार कमीज़ पहेन रखी थी.

मुझे अपनी तरफ ऐसे देखते पाया तो हँस पड़ी.

“मैने यहीं रहती हूँ, वो वहाँ पर मेरा घर है” हाथ से उसने पहाड़ के ढलान पर बने एक घर की तरफ इशारा किया “अक्सर शहर से लोग आते हैं और यहाँ रास्ता भूल जाया करते हैं. गेस्ट हाउस जाना है ना आपने?”

“हां पर यहाँ सब रास्ते एक जैसे ही लग रहे हैं. समझ ही नही आता के कौन से पहाड़ पर चढ़ु और किस से नीचे उतर जाऊं” मैने भी हँसी में उसका साथ देते हुए कहा.

मैं देल्ही से सरकारी काम से आया था. पेशे से मैं एक फोटोग्राफर हूँ और काई दिन से अफवाह सुनने में आ रही थी के यहाँ जंगल में एक 10 फुट का कोब्रा देखा गया है. इतना बड़ा कोब्रा हो सकता है इस बात पर यकीन करना ही ज़रा मुश्किल था पर जब बार बार कई लोगों ने ऐसा कहा तो मॅगज़ीन वालो ने मुझे यहाँ भेज दिया था के मैं आकर पता करूँ और अगर ऐसा साँप है तो उसकी तस्वीरें निकालु.

उत्तरकाशी तक मेरी ट्रिप काफ़ी आसान रही. देल्ही से मैं अपनी गाड़ी में आया था जो मैने उत्तरकाशी छ्चोड़ दी थी क्यूंकी वान्हा से उस गाओं तक जहाँ साँप देखा गया था, का रास्ता पैदल था. कोई सड़क नही थी, बस एक ट्रॅक थी जिसपर पैदल ही चलना था. मुझे बताया गया था के वहाँ पर एक सरकारी गेस्ट हाउस भी है क्यूंकी कुच्छ सरकारी ऑफिसर्स वहाँ अक्सर छुट्टियाँ मनाने आया करते थे.

मैं गाओं पहुँचा तो गाओं के नाम पर बस 10-15 घर ही दिखाई दिए और वो भी इतनी दूर दूर के एक घर से दूसरे घर तक जाने का मातब एक पहाड़ से उतरकर दूसरे पहाड़ पर चढ़ना. ऐसे में मैं गेस्ट हाउस ढूंढता फिर ही रहा था के मुझे वो लड़की मिल गयी.

यूँ तो उसमें कोई भी ख़ास बात नही थी पर फिर भी कुच्छ ऐसा था जो फ़ौरन उसकी तरफ आकर्षित करता था.

उसके सफेद रंग के कपड़े गंदे थे, बाल उलझे हुए, और देख कर लगता था के वो शायद कई दिन से नहाई भी नही थी.

“आइए मैं आपको गेस्ट हाउस तक छ्चोड़ दूं”

और तब मैने पहली बार उसकी आँखो में देखा. नीले रंग की बेहद खूबसूरत आँखें. ऐसी के इंसान एक पल आँखों में आँखें डालकर देख ले तो बस वहीं खोकर रह जाए.

वो मेरे आगे आगे चल पड़ी. शाम ढल रही थी और दूर हिमालय के पहाड़ों पर सूरज की लाली फेल रही थी.

चारों तरफ पहाड़, नीचे वादियों में उतरे बदल, आसमान में हल्की लाली, लगता था कि अगर जन्नत कहीं है तो बस यहीं हैं.

“ये है गेस्ट हाउस” कुच्छ दूर तक उसके पिछे चलने के बाद वो मुझे एक पुराने बड़े से बंगलो तक ले आई.

“थॅंक यू” कहकर मैने अपना पर्स निकाला और उसे कुच्छ पैसे देने चाहे. वो देखने में ही काफ़ी ग़रीब सी लग रही थी और मुझे लगा के वो शायद कुच्छ पैसो के लिए मुझे रास्ता दिखा रही थी.

मेरे हाथ में पैसे देख कर उसको शायद बुरा लगा.

“मैने ये पैसे के लिए नही किया था”

और वो खूबसूरत नीली सी आँखें उदास हो गयी. ऐसा लगा जैसे मेरे चारो तरफ की पूरी क़ायनात उदास हो गयी थी.

“आइ आम सॉरी” मैने फ़ौरन पैसे वापिस अपनी जेब में रखे “मुझे लगा था के…..”

“कोई बात नही” उसने मुस्कुरा कर मेरी बात काट दी.

मैने गेस्ट हाउस में दाखिल हुआ. मैने अंदर खड़ा देख ही रहा था के वहाँ के बुड्ढ़ा केर टेकर एक कमरे से बाहर निकला.

“मेहरा साहब?” उसने मुझे देख कर सवालिया अंदाज़ में मेरा नाम पुकारा

“जी हान” मैने आगे बढ़कर उससे हाथ मिलाया “आपसे फोन पर बात हुई थी”

“जी बिल्कुल” उसने मेरा हाथ गरम जोशी से मिलाया “मैने आपका कमरा तैय्यार कर रखा है”

उसने मेरे हाथ से मेरा बॅग लिया और एक गेस्ट हाउस से बाहर आकर एक गार्डेन की तरफ चल पड़ा. वो लड़की भी हम दोनो के साथ साथ हमारे पिछे चल पड़ी.
“तुमने घर नही जाना” मैने उसको आते देखा तो पुछा उसने इनकार में गर्दन हिला दी.

“मुझसे कुच्छ कहा साहिब” केर्टेकर ने आगे चलते चलते मुझसे पुछा

“नही इनसे बात कर रहा था” मैने लड़की की तरफ इशारा किया

हम तीनो चलते हुए गार्डेन के बीच बने एक कॉटेज तक पहुँचे. मुझे लगा था के एक पुराना सा गेस्ट और एक पुराना सा रूम होगा अपर जो सामने आया वो उम्मीद से कहीं ज़्यादा था. गेस्ट हाउस से अलग बना एक छ्होटा सा
कॉटेज जो पहाड़ के एकदम किनारे पर था. दूसरी तरफ एक गहरी वादी और सामने डूबता हुआ सूरज.

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